अर्धनारीश्वर

कहानियां लिखी नहीं जाती , वो तो अपने आसपास रोज़मर्रा की घटनाएं होती हैं जो लेखनी के माध्यम से कागज़ पर उतर जाती हैं और फिर पढ़ने वाले कहीं न कहीं खुद को कहानी में उतरा हुआ पाते हैं…..ये पंक्ति पूरी भी न हुई थी कि रसोई में से जलने की तीव्र गंध आई।

शिव भाग कर रसोई में पहुंचा तो दूध उबल कर गैस चूल्हे पर बिखरता हुआ स्लैब से नीचे टपक कर फर्श पर बह रहा था। दूध के पतीले के नीचे लग चुका दूध जल कर तेज़ महक मार रहा था।

इतने में कमरे में रखा मोबाइल बजा,शिव फ़ोन की ओर भागा, उधर दरवाज़े की घंटी बजी,फ़ोन देखा ऑफिस से बॉस का कॉल था जो उसे तुरंत न्यूज़ स्टोरी भेजने को कह रहा था।

फोन को हाथ में लिए दरवाज़ा खोलने जा रहा था कि मां के कमरे में से कुछ गिरने की आवाज़ आई,शिव का दिमाग़ शून्य हो गया कि किधर जाए। गिरते पड़ते दरवाज़ा खोला तो कामवाली का पति संदेश दे गया कि आज कमला काम पर नहीं आएगी।

भाग कर माँ के पास आया तो माँ बिस्तर के कोने पर बेसुध सी पड़ी थी उसके हाथ से छूटा पानी का गिलास बेड पर गिरने से बिस्तर गीला हो चुका था।

शिव घबरा गया । जैसे तैसे माँ को बिस्तर पर लिटा कर पड़ोस के डॉक्टर को कॉल करने ही लगा था कि माँ ने आंखे खोली दी और कमज़ोर सी आवाज़ में कहने लगी “चक्कर आ गया था बेटा एक कप गर्म दूध डाल दे”

शिव रसोई में गया जल्दी से गिलास धो कर माँ को दूध दिया। समय देखा सुबह के 9:30 बज चुके थे। पिछली रात बंटू को होमवर्क करवाते और घर का काम निपटाते शिव इतना थक गया था कि उसकी न्यूज़ स्टोरी पूरी नहीं हो सकी थी सोचा सुबह -सुबह उठ कर पूरी कर के मेल कर दूंगा ।

सुबह बंटू को बस स्टैंड छोड़ने गया तो बस नहीं आई।फौरन गाड़ी निकाल कर स्कूल छोड़ने गया।वापसी में दूध और लौकी लेते हुए आया। सोचा मां बीमार है उसके लिए लौकी और खिचड़ी बना देगा

घर वापस आते आते 8:50 हो गए थे।दूध को गैस पर चढ़ा कर वो अपनी स्टोरी पूरी करने लगा।पर सब कुछ इस तरह उलझ गया कि कोई सिरा हाथ नहीं आ रहा था।

कमला छुट्टी पर थी,माँ बीमार, ऑफिस का काम अधूरा, खाना पकाना, फैला घर,गंदी रसोई शिव को सब कुछ घूमता हुआ महसूस हुआ।

दूध का गिलास लेकर वो माँ के पास गया ,सहारा देकर माँ को उठाया और दूध कप में डाल कर माँ को दिया। एक घूंट भरते ही माँ बोली ” बेटा थोड़ी चीनी ले आ।कुशन के सहारे माँ को बिठा कर शिव चीनी लाने रसोई में गया तो ये क्या चीनी के डिब्बे में चींटियां भरी हुई थीं ।

उफ़्फ़!!!

ध्यान आया कि बंटू को तैयार करने की जल्दबाज़ी में चीनी के डिब्बे का ढक्कन लगाना तो भूल ही गया था।

जैसे तैसे माँ को चीनी दी , दूध पीते- पीते माँ कहने लगी ” बेटा गृहस्थी की गाड़ी दो पहियों पर मिलजुल चले है, तुम मियां बीवी अपना- अपना गुस्सा थूको और घर व बच्चे को मिल कर सम्हालो। जहाँ दो बर्तन होते हैं आवाज़ होती ही है ,तुम और बहू सुलह कर लो, जाओ गौरी को ले आओ

“बस कर माँ ,तू आराम कर मैं देख लूंगा” कहते हुए शिव अपनी स्टोरी पूरी करने लगा, सोचा मेल करने के बाद नाश्ता करूंगा, घर का कुछ काम निपटा कर हाफ़ डे के बाद ऑफिस चला जाऊंगा” कि फिर से फोन घरघराया…

पता चला कि उसे सीधे विज्ञान भवन में विशेष कवरेज के लिए जाना होगा,मंत्री जी आ रहे हैं। वरिष्ठ पद पर होने के कारण उसका जाना जरूरी है।

शिव ने सर पकड़ लिया । एक के बाद एक उलझन, जिसका कोई सिरा हाथ न आता था।फटाफट खिचड़ी चढ़ाई और जल्दी जल्दी नहा कर कपड़े निकाले तो उन पर सलवटें थी।प्रेस लगाई तो कूकर की सीटी बज गई और खिचड़ी का झाग बाहर आने लगा।

भागते दौड़ते तैयार हो कर याद आया कि बंटू को बस स्टैंड से भी लाना है।अब क्या करूँ???

सामने वाली मिसेज़ भाटिया से विनम्र हो कर कहा कि वो अपने बेटे को लेने जाए तो बंटू को भी बस स्टैंड से घर तक पहुंचा दे।

“गौरी भाभी घर पर नहीं है क्या” मिसेज़ भाटिया ने सवाल किया

जी नहीं, वो मायके गई है और इधर मां की भी तबियत ठीक नहीं है। शिव ने कहा

तो फिर गौरी भाभी को जाने की क्या ज़रूरत थी।आप उनको कॉल करो।नहीं तो मैं करती हूँ।

नहीं नहीं आप कॉल न करें ,कहते हुए शिव वहां से चल दिया।

ट्रैफिक से जूझते हुए किसी तरह विज्ञान भवन पहुंचा ,मंत्री जी के आने में देर थी।

शिव को कुछ अजीब सी तबियत महसूस हुई, याद आया कि उसने सुबह से कुछ खाया नहीं था।

कैंटीन से चाय और सैंडविच ले कर वो आकर बैठा तो बहुत कुछ आंखों के सामने आने लगा ।

मिसेज़ भाटिया के शब्द कानों में गूंजने लगे कि “गौरी भाभी को जाने की क्या ज़रूरत थी”

शिव ने आँखे बंद कर लीं, गौरी को वाकई नहीं जाना चाहिए था, वो गई क्यों,

क्यों गई वो???

सोचते सोचते सब कुछ उसकी आंखों के आगे तैर गया।

गौरी हर तरह से उसका ख्याल रखती थी। वो खुद भी वर्किंग थी पर घर भी इतनी कुशलता से चलाती थी कि किसी को कोई शिकायत का मौका नहीं दिया कभी।

मीडिया लाइन में होने की वजह से शिव न तो घर को कभी देख पाया और न ही गौरी को समय दे पाया जिसका मलाल शिव को होता था वो सॉरी भी कहता था लेकिन गौरी ने कभी कुछ न कहा ।धीरे धीरे ये सब रूटीन सा हो गया।

उस शाम उसकी शादी के साल गिरह थी,तय हुआ कि दोनो ऑफिस से जल्दी आएंगे।

गौरी ने सरप्राइज देने के लिए एक छोटी सी पार्टी रख ली और दो पारिवारिक मित्रों को आमंत्रित कर लिया और शिव की राह देखने लगी।

रात करीब 11:30 बजे तक इंतज़ार के बाद मायूस हो कर गौरी ने मेहमानों को खाना खिला कर विदा कर दिया।माँ व बंटू को सुलाने के बाद खुद भूखी सो गई।

रात 12 बजे के करीब शिव आया और बोला कि वो खाना खा कर आया है ।

गौरी का सब्र जवाब दे गया। और 9 वर्ष के विवाहित जीवन के सारे ताने और उलाहने दोनो की ज़ुबान पर आ गए। तक़रार इतनी बढ़ी कि गौरी ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया और अगले दिन सुबह – सुबह घर से चली गयी।गुस्से और ज़िद में शिव ने रोका भी नहीं

आज गौरी को गए तीसरा दिन था। इन तीन दिनों की दिनचर्या में शिव का दिमाग़ भन्ना गया था। सब कुछ होते हुए भी शून्य सा एहसास था।

शिव ने आँखें खोली, सामने रखी चाय से उठती भाप को देखते हुए शिव के अंतस में कुछ पिघलने लगा। कई पल आंखों के आगे के आगे आ गए ।

व्यस्त होने के वजह से गौरी ने पारिवारिक आयोजनों में किस तरह उसकी अनुपस्थिति को सम्हाला था, अपनी नौकरी ,घर ,बीमार माँ और बच्चे की पढ़ाई के बीच संतुलन कायम रखा था,उसकी हर ज़रूरत का ध्यान रखा,कभी कोई शिकायत नहीं….घर,परिवार, समाज सब जगह, हर दुख – सुख वो हमेशा उसके साथ रही ,आर्थिक स्तर पर भी कंधे से कंधा मिला कर उसका सम्बल बनी।

शिव को गौरी पर प्यार उमड़ पड़ा

उसने तुरंत गौरी को फोन लगाया

सॉरी गौरी…..

और फिर ….. फोन पर एह्सास इतनी गर्मजोशी से मिले कि शिव के सामने रखी चाय ठंडी हो गई।

गौरी के बिना शिव कहां….

गौरी तो शिव की शक्ति है , यों ही उसे अर्धनारीश्वर नहीं कहते न।

मौलिक लेखन

—-सुखनंदन बिन्द्रा

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